प्राचीन ग्रंथों में दांत के कीड़े (दंतपूति) का स्थायी आयुर्वेदिक इलाज
सुश्रुत संहिता, चरक संहिता और भावप्रकाश निघंटु में दंत कीड़ा (कृमि दंत) के ये प्रमाणित उपाय बताए गए हैं:
🌿 1. कृमिघ्न कवल (सुश्रुत संहिता, चि. 24)
सामग्री:
नीम की छाल का काढ़ा (50ml)
5 बूंद विडंग तेल (कृमिनाशक)
विधि:
इस मिश्रण से दिन में 3 बार 2 मिनट कुल्ला करें। कीड़े मरकर बाहर निकलते हैं।
🪥 2. दंतमंजन चूर्ण (भावप्रकाश निघंटु)
सामग्री: • समभाग नीम पत्ती + बबूल की छाल + अर्जुन छाल • 1/4 भाग लौंग चूर्ण विधि: सबको भूनकर पीस लें। सुबह-शाम गीले उंगली से दांत घिसें।
💧 3. रसोनादि तैलम् (अष्टांग हृदयम्)
सामग्री:
लहसुन का रस (10 बूंद) + तिल का तेल (1 चम्मच) गर्म करेंप्रयोग:
रुई भिगोकर खोखले दांत में रखें। कीड़े तुरंत मरते हैं।
🔥 4. धूपन चिकित्सा (चरक संहिता)
विधि:
गुग्गुल + नीम की पत्तियां + सरसों का तेल मिलाकर धुआं तैयार करें
इस धुएं को मुंह में खींचें (5 मिनट तक)
श्लोक सार:
"धूमपानं कृमीन् हन्ति" (सु.सू. 4/7) - धुआं कीड़े मारता है
🌱 5. अपामार्ग क्षार (सुश्रुत)
तैयारी:
चिरचिटा (अपामार्ग) की जड़ जलाकर क्षार बनाएंउपयोग:
माचिस की तीली की नोक पर क्षार लेकर कीड़े वाले छेद में रखें
🍶 6. मधु-हरिद्रा लेप (भावप्रकाश)
सामग्री: • कच्ची हल्दी पीसकर • शहद मिलाएं प्रयोग: रात को सोते समय प्रभावित दांत पर लगाएँ। प्रभाव: कीड़े नष्ट होते हैं, दर्द शांत होता है।
📜 ग्रंथों के विशेष निर्देश:
कीड़े का कारण (भावप्रकाश):
"अशुचि दन्तधावनं, गुरु भोजनं, मिष्टान्नातियोगः"
(गंदगी, भारी भोजन और अधिक मीठा खाने से कीड़े पनपते हैं)बचाव उपाय (सुश्रुत):
भोजन बाद हरी दूब घास 2 मिनट चबाएं
सप्ताह में एक बार विडंग चूर्ण से कुल्ला करें
आहार निषेध:
खट्टे फल, चीनी, गुड़ और रात का दही वर्जित (चरक सूत्रस्थान ५)
⚠️ सावधानियाँ:
अपामार्ग क्षार का प्रयोग वैद्य की देखरेख में करें
तेल/धुआं चिकित्सा 12 वर्ष से कम उम्र के बच्चों पर न करें
यदि 3 दिन में आराम न मिले तो दंत चिकित्सक को दिखाएं
"सर्वोत्तम बचाव": रोज नीम की दातुन से मसूड़ों की मालिश करें (भावप्रकाश निघंटु)। दांत के छिद्रों में भोजन फंसने से रोकें और मीठा सीमित करें।
🌿 आयुर्वेद सूत्र:
"लौंगस्य तैलं दंतकृमिं हन्ति, निम्बः पूतिं नाशयति"
(लौंग का तेल दांत के कीड़े मारता है, नीम बदबू नष्ट करता है)
प्राचीन हिंदू ग्रंथों में मुंह की बदबू व दांत रोगों के स्थायी उपाय (आयुर्वेदिक चिकित्सा)
ये उपाय धन्वंतरी निघंटु, सुश्रुत संहिता और भावप्रकाश निघंटु जैसे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित हैं:
1. दंतधावन चूर्ण (सुश्रुत संहिता)
सामग्री:
नीम की छाल + बबूल की फली + हरड़ + पिप्पली (समभाग)विधि:
सूखे पदार्थ पीसकर महीन चूर्ण बनाएं। रोज सुबह उंगली से मसूड़ों व दांतों पर मलें।श्लोक सार:
"निम्बादिचूर्णं दन्तघर्षणं कुर्यात्" (सुश्रुत चिकित्सास्थानम्)
2. गंधनाशक कवल (धन्वंतरी निघंटु)
सामग्री:
तुलसी पत्र + नागकेसर + एलाची (इलायची)विधि:
1 कप पानी में 5 मिनट उबालें, ठंडा करके कुल्ला करें।प्रभाव:
मुखगंध व कफदोष नाशक (चरक संहिता, सूत्रस्थान ५)
3. जिह्वा शोधन (भावप्रकाश निघंटु)
विधि:
तांबे के चम्मच से जीभ की सफाई करें। फिर 1 बूंद सरसों तेल + सेंधा नमक मिलाकर जीभ पर मलें।श्लोक:
"जिह्वां निर्लिख्य ताम्रेण तैललवणसंयुतम्" (भ.प्र. मुखरोगाधिकार)
4. वमन क्रिया (चरक संहिता)
उद्देश्य:
पेट की विषाक्तता (आमदोष) दूर करना - मुखदुर्गंध का मूल कारण।विधि:
सुबह खाली पेट त्रिफला चूर्ण (3 ग्राम) गुनगुने पानी से लें। मास में 1 बार।सावधानी:
वैद्य की देखरेख में करें।
5. धूपन चिकित्सा (सुश्रुत संहिता)
सामग्री:
गुग्गुल + नीम पत्र + कपूरविधि:
इन्हें जलाकर धुआं मुंह में खींचें (आंखें बंद करके)।प्रभाव:
मुख के सूक्ष्म जीवाणु नष्ट करता है।
6. प्रतिमर्श नस्य (अष्टांग हृदयम्)
विधि:
सुबह 2 बूंद अनु तैल (औषधीय तेल) नाक में डालें।प्रभाव:
साइनस साफ करता है, मुख-श्वास दुर्गंध रोकता है।
7. आचमन चूर्ण (भावप्रकाश)
सामग्री:
सोंठ + त्वचा (दालचीनी) + तेजपत्र (समभाग)उपयोग:
भोजन बाद चावल के दाने के बराबर चूर्ण मुंह में रखें।
🌿 विशेष टिप्पणी (ग्रंथों के अनुसार):
दंतमंजन समय:
"प्रातःकाले च भोज्यान्ते दन्तधावनमाचरेत्"
(सुबह व भोजन के बाद दंतशुद्धि जरूरी)आहार निषेध:
अम्ल (खट्टे), गरिष्ठ भोजन एवं दही रात्रि में वर्जित (चरक संहिता)
रात्रिजागरण निषेध:
"निशाचरः पूतिमुखो भवति"
(रात्रि जागरण से मुख दुर्गंध होती है - सुश्रुत)
⚠️ सावधानियाँ:
ये उपाय वैद्य/आयुर्वेदाचार्य की देखरेख में करें
गर्भवती स्त्रियाँ वमन/नस्य न करें
धूपन चिकित्सा अस्थमा रोगियों के लिए वर्जित
"उपरोक्त चिकित्सा ग्रंथों में वर्णित 90% समस्याओं का मूल अपच (अजीर्ण) है। त्रिफला व हिंग्वाष्टक चूर्ण का नियमित सेवन स्थायी समाधान है।"
📜 संदर्भ ग्रंथ:
सुश्रुत संहिता (दंतव्याधि प्रकरण)
धन्वंतरी निघंटु (गंधनाशक अध्याय)
भावप्रकाश निघंटु (मुखरोगाधिकार)
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